कांग्रेस की आदिवासी सत्याग्रह रैली, जानिए गुजरात विधानसभा चुनाव में आदिवासी वोट का महत्व

कांग्रेस की आदिवासी सत्याग्रह रैली, जानिए गुजरात विधानसभा चुनाव में आदिवासी वोट का महत्व

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Tribal Vote Bank: गुजरात विधानसभा के चुनाव में बीजेपी-आप के बाद अब कांग्रेस भी आदिवासियों के वोट बैंक को मजबूत करने के लिए मैदान में उतर चुकी है. अपनी परंपरागत वोट बैंक को वापस लाने के प्रयास में कांग्रेस आज से आदिवासी सत्याग्रह सम्मेलन की शुरुआत करने जा रही है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की अगुवाई में आज से अगले 6 महीने तक गुजरात में कांग्रेस आदिवासी सत्याग्रह सम्मेलन नाम से कार्यक्रम शुरू कर रही है. उमरगाव से अंबाजी तक के आदिवासी बेल्ट पर चलने वाले इस कार्यक्रम की शुरुआत दाहोद से होने जा रही है. गुजरात की स्थापना से 2001 तक इस बेल्ट पर कांग्रेस का परचम लहराता रहा. लेकिन 2001 के बाद बीजेपी ने भी आदिवासी वोट बैंक में अपनी जड़े जमा रखी है.

कांग्रेस-बीजेपी की ही नहीं, आप की निगाहें भी आदिवासी मतदाता पर

इस साल के अंत तक गुजरात विधानसभा के चुनाव है. पंजाब में जीत मिलने के बाद आम आदमी पार्टी पहली बार गुजरात में अधिकांश सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है, तो स्वाभाविक तौर पर पहली बार त्रिकोणीय जंग होने जा रहा है. नरेन्द्र मोदी 20 अप्रैल को दाहोद में आदिवासियों के बीच कार्यक्रम कर चुके हैं. इतना ही नहीं,  पीएम नरेंद्र मोदी इस क्षेत्र में 21 हजार करोड़ से भी ज्यादा राशि के विकास कार्यो का लोकार्पण और शिलान्यास कर चुके हैं. तो वहीं गुजरात में जड़े जमाने का प्रयास कर रही आम आदमी पार्टी की ओर से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 1 मई के दिन ही आदिवासी बेल्ट के भरूच के चंदेरिया में बड़ी रैली की थी. वहीं, भारतीय ट्राईबल पार्टी के मुखिया छोटुभाई वसावा से मंच साझा करके आप के साथ गठबंधन की घोषणा की थी. भरूच जिले में आदिवासी आरक्षित दो बैठकों पर छोटु वसावा एवं उनके बेटे महेश वसावा का कब्जा है. स्वाभाविक तौर पर आप के साथ गठबंधन कर के अपने आदिवासी मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने का पहला कदम उठाया.

आदिवासी वोट बैंक का गुजरात में क्या है महत्व

182 सीटों वाली विधानसभा में आदिवासियों के लिए 27 सीटें आरक्षित हैं. साल 2002 के पहले विधानसभा हों या लोकसभा आदिवासी परंपरागत तौर पर कांग्रेस की वोट बैंक हुआ करती थी. कांग्रेस हर चुनाव के वक्त प्रचार की शुरुआत भी इसी आदिवासी इलाकों से ही करती थी. फि साल 2001 में नरेंद्र मोदी की एंट्री के बाद कांग्रेस की इस वोट बैंक में बीजेपी ने बहुत बड़ा बदलाव किया. वन बंधु योजना के नाम पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई सारे विकास के कार्य आदिवासी इलाके में किए, जिसके चलते कांग्रेस के हाथ से धीरे-धीरे ये वोट बैंक खिसकने लगी. हालांकि 2017 में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 17 सीटें इसी इलाके से मिली थीं. लेकिन 17 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के दो विधायकों ने इस्तीफा देकर बीजेपी जॉइन कर ली है. वहीं कांग्रेस के आदिवासी विधायक अनिल जोषियारा का निधन हो गया.

आदिवासी बेल्ट पर अधिकांश सीटें हासिल करने के लिए 2020 में जीतू चौधरी नाम के कांग्रेसी विधायक को इस्तीफा दिलवाकर बीजेपी ने टिकट देकर न सिर्फ विधायक बनाया, बल्कि उन्हें भूपेन्द्र पटेल सरकार में मंत्री भी बनाया. साबरकांठा की खेडब्रह्मा सीट से लगातार 3 बार चुनाव जीतने वाले अश्विन कोटवाल को हाल ही में विधायक के तौर पर इस्तीफा दिलवाकर कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल कर लिया. गुजरात में जनसंख्या के आधार पर देखें तो कुल मतदान का 14 प्रतिशत मतदाता आदिवासी है.

विकसित माने जाने वाले गुजरात में आदिवासी इलाकों में आज भी पानी, शिक्षण, स्वास्थ्य एवं रोजगार को लेकर बड़ा मुद्दा है. वहीं जंगल और जमीन हर चुनाव का आदिवासी इलाके में मुद्दा बनता रहा है.

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