मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि और ईदगाह मस्जिद को लेकर क्या है विवाद

मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि और ईदगाह मस्जिद को लेकर क्या है विवाद

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Disputed Land In Mathura: अयोध्या की बाबरी मस्जिद और राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से काशी के विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के श्री कृष्ण जन्मभूमि स्थान को लेकर भी मांग उठने लगी है कि इस परिसर के पास जो मस्जिद बनाई गई है उनका भी सर्वे करवाया जाए. आरोप है कि मथुरा की ईदगाह मस्जिद का निर्माण मंदिर को तोड़कर किया गया था. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर मामले में जिस आधार पर अपना फैसला दिया है उसी तर्ज पर यहां पर भी रिपोर्ट तैयार करवाई जाए और अगर रिपोर्ट में यह साबित हो जाता है कि मंदिरों को तोड़कर इस मस्जिद का निर्माण किया गया है तो उसको वहां से हटाया जाए. मथुरा के श्री कृष्ण जन्मभूमि स्थान और ईदगाह मस्जिद को लेकर आखिर है पूरा विवाद जानिए एबीपी न्यूज़ संवाददाता अंकित गुप्ता की इस रिपोर्ट में.

मथुरा का श्री कृष्ण जन्मभूमि स्थान जहां पर हर साल करोड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि श्री कृष्ण का जन्म इसी स्थान पर हुआ था, यहीं पर मथुरा के राजा कंस का वह कारागार था जहां पर देवकी ने कृष्ण को जन्म दिया था. लेकिन फिलहाल अब इस जन्म स्थान को लेकर उठा विवाद लगातार तूल पकड़ता जा रहा है. चलिए आप को सिलसिलेवार तौर पर बताते हैं कि आखिर यह पूरा विवाद है क्या?

कंस के कारागार पर ईदगाह मस्जिद

मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि स्थान परिसर में जो मंदिर बना हुआ है उसी से सटी खड़ी है यह ईदगाह मस्जिद. अदालत में ये कहा गया है कि जिस जगह पर यह ईदगाह मस्जिद बनाई गई है वहीं पर कंस का वो कारागार था जहां पर श्री कृष्ण का जन्म हुआ था. मुगल सम्राट औरंगजेब ने साल 1669-70 के दौरान श्री कृष्ण जन्मभूमि स्थल पर बने मंदिर को तोड़ दिया और वहां पर इस ईदगाह मस्जिद का निर्माण करवा दिया था. फिलहाल ये मामला एक बार फिर से कोर्ट पहुंच चुका है. हिंदू पक्षकारों ने मांग की है कि इस मस्जिद परिसर के सर्वे के लिए एक टीम का गठन किया जाए जो मुआयना करके बताएं क्या इस मस्जिद परिसर में हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां और प्रतीक चिन्ह मौजूद हैं जो ये बताते हैं कि यहां पर इस मस्जिद से पहले हिंदुओं का मंदिर हुआ करता था.

याचिकाकर्ता महेंद्र प्रताप सिंह का क्या कहना है?

याचिकाकर्ता महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि अदालत में दायर याचिका में ये भी सवाल उठाया गया है कि जब यह जमीन श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की थी तो आखिर श्री कृष्ण जन्मभूमि सेवा संस्थान नाम की संस्था ने 1968 में ईदगाह कमेटी के साथ मस्जिद को न हटाने का फैसला किस आधार पर कर लिया. दरअसल श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के नाम से एक सोसाइटी 1 मई 1958 में बनाई गई थी. इसका नाम 1977 में बदलकर श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान कर दिया गया था। 12 अक्टूबर 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ एवं शाही मस्जिद ईदगाह के प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता किया गया कि 13.37 एकड़ भूमि पर श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर और मस्जिद दोनों बने रहेंगे.  फिर 17 अक्टूबर 1968 को यह समझौता पेश किया गया और 22 नवंबर 1968 को सब रजिस्ट्रार मथुरा के यहां इसे रजिस्टर किया गया था. ये विवाद कुल मिलाकर 13.37 एकड़ भूमि के मालिकाना हक का है, जिसमें से 10.9 एकड़ जमीन श्री कृष्ण जन्मस्थान के पास और 2.5 भूमि शाही ईदगाह मस्जिद के पास है.

मंदिर तोड़कर नहीं हुआ मस्जिद का निर्माण

हालांकि ईदगाह मस्जिद के सचिव और पेशे से वकील तनवीर अहमद के मुताबिक जो लोग मस्जिद को मंदिर का हिस्सा बता रहे हैं वह तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहे हैं. क्योंकि इतिहास में कोई भी ऐसा तथ्य नहीं है जो यह बताता है कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को तोड़कर किया गया था या श्री कृष्ण का जन्म उस जगह पर हुआ था जहां पर मौजूदा ईदगाह मस्जिद बनी हुई है. मुस्लिम पक्ष की तरफ से अदालत में एक और दलील जो प्रमुखता से पेश की जा रही है वह है 1991 का वर्कशिप एक्ट. मुस्लिम पक्ष के मुताबिक इस एक्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि देश में 1947 से पहले धार्मिक स्थलों को लेकर जो स्थिति थी वह उसी तरह बरकरार रखी जाएगी और उसमें कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी. हालांकि इसमें राम जन्मभूमि का विवाद एक अपवाद था. तो वहीं हिंदू पक्ष कार और वकील इस दलील का ये कहते हुए विरोध कर रहे हैं कि ऐसा नहीं है कि यह मामला अचानक दायर हुआ. वर्कशिप एक्ट में भी कहा गया है कि अगर किसी मामले में लगातार अदालतों में मामले दायर होते रहे हैं या लंबित है तो वह मामला 1991 के वर्कशिप एक्ट के तहत नहीं आएगा.

मंदिर या मस्जिद विवाद बरकरार

यहां यह पता लगाना भी जरूरी है कि क्या हिंदू पक्ष लगातार जिस बात का दावा कर ईदगाह मस्जिद की जगह मंदिर होने की बात कर रहा है क्या स्थानीय लोगों या पत्रकारों के पास ऐसी कोई जानकारी मौजूद है कि इस जगह पर मस्जिद के निर्माण से पहले हिंदू मंदिर हुआ करता था. एबीपी न्यूज़ संवाददाता अनिल अत्री जो सालों से मथुरा में रह रहे हैं और एबीपी न्यूज़ के लिए रिपोर्टिंग कर रहे हैं उनका कहना है कि इस चीज को लेकर अभी किसी को भी स्पष्ट पता नहीं है क्योंकि मस्जिद के उस हिस्से में किसी को जाने की अनुमति नहीं है.

तो क्या अदालत में होगी सुनवाई?

अब क्योंकि यह मामला अदालत में लंबित है और अदालत में इससे जुड़ी हुई अलग-अलग याचिकाएं लंबित है तो अब अदालत को ही तय करना है कि आखिर किस पक्ष की दलीलों में कितना दम है. लेकिन उससे पहले अदालत इसी महीने की 19 तारीख को एक मामले में यह तय करेगी कि क्या यह मामला सुनने योग्य है भी या नहीं और अगर अदालत के इस मामले को सुनने योग्य पाती है तो इस मामले में वह सारे तथ्य और सबूत भी आएंगे जिनके आधार पर यह हिंदू पक्ष ईदगाह मस्जिद की जगह मंदिर परिसर होने की बात कर रहा है. मुमकिन है कि ज्ञानवापी मस्जिद मामले में जिस तरह अदालत का आदेश आया है उसी तरह का आदेश इस मामले में भी सामने आए जहां पर अदालत मस्जिद परिसर का सर्वे और वीडियोग्राफी करने का आदेश दें लेकिन यह सब तब होगा जब अदालत इन याचिकाओं को सुनने योग्य मानेगी और सारे तथ्यों पर आगे की सुनवाइयों के दौरान विचार करे.

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